जिस चिराग पासवान को बिहार के लोग कभी भविष्य का मुख्यमंत्री मान रहे थे…आज वही चिराग एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़े हैं, जहां उनके सामने सबसे बड़ा सवाल चुनाव जीतने का नहीं… बल्कि अपना वोटबैंक बचाने का है।.......सवाल ये नहीं है कि चिराग पासवान ने आरक्षण पर क्या भाषण दिए या कितनी रैलियां कीं…सवाल ये है कि चुनाव में 80% से ज्यादा गैर-दलितों का वोट लेने वाले चिराग .... अब पूरे बिहार के नहीं, बल्कि सिर्फ दलितों के नेता और मोदी के हनुमान बनकर क्यों रह गए है . आखिर चिराग की राजनीति इस मोड़ तक पहुंची कैसे?… और क्या आरक्षण पर उनका स्टैंड उनके सियासी कैरियर अंतिम किल साबित होगा ... चालिए समझते है इस २ मिनिट की रिपोर्ट में .................
आरक्षण पर दिए उनके बयान… भले ही उन्हें उस एक वर्ग का मसीहा बना दें, लेकिन क्या सिर्फ एक दलित वोटबैंक के सहारे चिराग बिहार की राजनीति में वो मुकाम हासिल कर सकते हैं, जिसका सपना कभी उनके पिता रामविलास पासवान ने देखा था?. और ये हुआ भी चिरग को न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के लोग पसंद करने लगे। पढ़े-लिखे, मॉडर्न सोच वाले एक नेता के तौर पर चिराग की पहचान बनने लगी थी। सवर्ण हो, ओबीसी हो, युवा सब चिराग को बिहार का सीईम बनते देखना चाहते थे ..................................लेकिन… आरक्षण सुधारों पर दिए उनके बयानों ने एक झटके में सब बदल दिया। वही चिराग पासवान जो कल तक बिहार के युवा नेता थे… आज सिर्फ दलितों के लीडर बनकर रह गए। जो गैर-दलित वर्ग उनसे जुड़ने लगा था… वही वर्ग अब उनसे किनारा करने लगा है। और सिर्फ गैर-दलित ही नहीं वो दलित भी उनसे दूर हो रहे है .. जिन्हें आज़ादी के ८० साल बाद भी आरक्षण नहीं मिला ...
पिछले कुछ सालों में चिराग पासवान की राजनीति को जिस किसी ने करीब से देखा है… उसने एक बात साफ़ महसूस की होगी। की 2024 के लोकसभा चुनाव में जब चिराग पासवान मैदान में उतरे… तो उनकी पार्टी लोजपा (रामविलास) ने 5 सीटों पर चुनाव लड़ा और 5 की 5 सीटें जीत लीं। पार्टी को करीब 6.47% वोट मिला। लेकिन.. अगर आपको लगता है कि चिराग पासवान सिर्फ अपनी 5.3% पासवान बिरादरी के दम पर यह चुनाव जीते हैं… तो ऐसा बिलकुल नहीं है
जिन 5 सीटों पर चिराग ने 100%स्ट्राईक रेट के साथ जीत दर्ज की .. उसमे 15% सवर्ण आबादी और 50% से ज्यादा OBC/EBC वोटबैंक था… जिन्होंने चिराग को एनडीए का सर्वमान्य चेहरा मानकर एकमुश्त वोट दिया।..........................2020 में अकेले लड़कर 1 सीट (5.66% वोट) पर सिमटने वाले चिराग की पार्टी ने 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन केसाथ 29 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें अपने नाम की हैं।.. लेकिन चिराग पासवान ने सिर्फ अपनी 5.3% पासवान बिरादरी के दम पर यह चुनाव जीते हैं...... यानी इस बार भी उन्हें 37% से 40% वोट सभी जातियों का मिला .........
आंकड़े बताते हैं कि बिहार में कुल शेद्यूअल कास्ट पापुलेशन19.65% है… जिसमें से चिराग पासवान जिस समाज से आते हैं, यानी पासवान समाज… उसकी आबादी सिर्फ 5.31% है। यानी बाकी 14.34% आबादी उन जातियों की है —जो आज भी विकास की दौड़ में सबसे पीछे हैं।.. लेकिन 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST आरक्षण में Sub-classification और Creamy Layer की बात कही , तो चिराग ने फैसले का खुलकर विरोध किया, रिव्यू पिटीशन डाली, 21 अगस्त 2024 के भारत बंद का समर्थन किया और उन्हीं 14% महादलितों का हक मांगने वाले… अपने ही एनडीए सहयोगी जीतन राम मांझी से… सीधे भिड़ गए।
सवाल ये नहीं है कि चिराग का स्टैंड सही था या गलत… सवाल ये है कि जब 14% वंचितों को उनका हक मिलने की बात आई… तो चिराग किसके साथ खड़े थे?
चिराग पासवान को वोट बिहार के सवर्णों ने भी दिया… ओबीसी और ईबीसी वर्ग ने भी दिया… और उन युवाओं ने भी दिया जो चिराग में बिहार का नया चेहरा देख रहे थे। यानी चुनाव में चिराग को सबका वोट चाहिए था। उन्होंने खुद को 'बिहार फर्स्ट' का नेता बताया… हर बिहारी के हक की बात की… और लोगों ने उन पर भरोसा भी किया। ................लेकिन चुनाव में 80% से ज्यादा गैर-दलितों का वोट लेने के बाद… फैसले के वक्त चिराग की राजीनीति सिर्फ 5% तक सिमित चुकी है ..... और यही है चिराग पासवान की राजनीति का वो सच… जो आंकड़े बताते हैं। चुनाव में 80% से ज्यादा गैर-दलितों का वोट लेने वाले चिराग… फैसले के वक्त 5.31% की राजनीति करने लगते हैं।
29 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें अपने नाम करने वाले चिराग… जब गठबंधन के सहारे जीतते हैं… तो उन्हीं गैर-दलित वोटरों को भूल जाते हैं… जिन्होंने उन्हें जिताया था। सवाल ये नहीं है कि चिराग पासवान अच्छे नेता हैं या बुरे… सवाल ये है कि जो नेता वोट सबका लेकर फैसला सिर्फ एक वर्ग के लिए करे… वो बिहार के 13 करोड़ लोगों का मुख्यमंत्री बनने का दावा कैसे कर सकता है? और शायद यही वो सबसे बड़ा सवाल है… जो आज चिराग पासवान के सामने खड़ा है।
जवाब उन्हें देना है… बिहार की उस जनता को… जिसने कभी उनमें भविष्य का मुख्यमंत्री देखा था। आपकी क्या राय है? क्या चिराग पासवान अब भी पूरे बिहार के नेता बन सकते हैं… या 5% की राजनीति ने उनके सियासी भविष्य पर हमेशा के लिए पर्दा डाल दिया है? कमेंट बॉक्स में बेबाक राय ज़रूर लिखें। चैनल को लाइक और सब्सक्राइब करना न भूलें। जय हिंद!

